कॉफी के हर घूँट के साथ वह चीज स्टिक को परियों की जादुई छड़ी की तरह घुमाती किस्से सुना रही थी। वह वशीभूत सा बैठा सुन रहा था। जब भी वह कुछ कहती, एक उत्कंठा हमेशा उसे घेर लेती। उसकी दुनिया अजनबी नहीं रही थी, वह बिना दस्तक दिए ही उसके मन पर अपना कब्जा जमा चुकी थी। हम यों ही कभी-कभी मिल सकते हैं क्या? पूछते समय अपने स्वर में लरजते कंपन को महसूस किया उसने। वह उसे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता था। क्योंकि अब उसे पता था, वह क्या चाहता है। वह मुसकराई। हाँ, मिल सकते हैं। वैसे मेट्रो में तो अकसर मुलाकात हो ही जाती है, फिर क्या कॉफी पीने के लिए मिलना जरूरी है? उसकी आँखों में शरारत थी। चलो मिल लेंगे यों भी कभी-कभी, पर नो कमिटमेंट। उम्मीदों के पहाड़ मत खड़े कर लेना देव बाबू। मैं पारो नहीं हूँ, न ही बनना चाहती हूँ।